A short story

दोपहर का समय !
अभी-अभी वर्षा थमी थी |
बादल बरस के खाली हो गए थे |
तारकोल की लंबी-लंबी सडकें धुलकर साफ़ हो गई |
गड्ढों में पानी इकट्ठा हो गया |
कभी-कभार हवा का झोंका आ रहा था |
पर वातावरण में उमस थी |
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इस प्राकृतिक ऊमस से भी मन की ऊमस ज्यादा खतरनाक होती है |
एक साधक मन की ऊमस से घबरा कर साधना मार्ग से वापिस मुड़ने की सोच रहा था |
कुछ भौतिक प्रलोभनों से वह विक्षिप्त-सा बन गया था |
साधना उसे नीरस लगने लगी थी |
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मुनि सोचने लगा –
” सांसारिक सुखों का अनुभव किये बिना ही मैंने साधना का यह कंटकाकीर्ण पथ चुन लिया है |
कौन जानता है इसका परिणाम क्या आएगा ?
इतने बड़े-बड़े साधक मेरे सामने हैं |
इन्होने साधना से अपने शरीर को खपा दिया है |
फिर भी इन्हें क्या मिला ?
यह साधना-पथ मुझे भी धोखा न् दे दे |
इसी उधेड़-बुन में उसे नींद आ गयी |
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आचार्य ने साधक की मन:स्थिति का अध्ययन करके निर्देश की भाषा में कहा –
” जब तुम साधना-पथ में उठ ही गए हो,
तो फिर प्रमाद क्यों ?
जाग जाने के बाद प्रमाद करना दोहरी भूल है |
तुम आत्म-बोध के लक्ष्य को छोड़कर बाहय जगत की चकाचौंध में मत उलझो |
अपने विवेक को जागृत करने के लिये –
जागृत और सुप्त व्यक्ति की गति का अध्ययन करो |
जागृति ही जीवन है,
इस तथ्य को विस्मृत मत करो |”
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गुरु के इस निर्देश से शिष्य को समाधि मिल गयी
और
उस साधक के भौतिक आकर्षण टूट गए |
ओम अर्हम…
~ संघमहानिदेशिका महाश्रमणी साध्वी प्रमुखा श्री कनकप्रमुखा जी की पुस्तक ” सत्य का पंछी : विचारों का पिंजरा पृष्ठ संख्या २०५ ” से

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