Jainism on Ahimsa

जैनदर्शन”

” अहिंसा पर जैन दृष्टि”

जैन दृष्टि से सब जीवों के प्रति संयमपूर्ण व्यवहार अहिंसा है। अहिंसा का
शब्दानुसारी अर्थ है, हिंसा न करना। इसके पारिभाषिक अर्थ विध्यात्मक और
निषेधात्मक दोनों हैं। रागद्वेषात्मक प्रवृत्तिन करना, प्राणवधन करना
याप्रवृत्ति मात्रका विरोधकरना निषेधात्मक अहिंसा है;
सत्प्रवृत्ति,स्वाध्याय, अध्यात्मसेव,उपद ेश, ज्ञानचर्चा आदि आत्महितकारी
व्यवहार विध्यात्मक अहिंसा है। संयमी के द्वारा भी अशक्यकोटि का प्राणवध
होजाता है, वह भी निषेधात्मक अहिंसा हिंसा नहीं है। निषेधात्मक अहिंसा
में केवल हिंसा कावर्जन होताहै, विध्यात्मकअहिंसा में सत्क्रियात्मक
सक्रियताहोती है। यह स्थूल दृष्टि का निर्णयहै। गहराई में पहुँचने पर
तथ्य कुछ और मिलता है। निषेध में प्रवृत्ति और प्रवृत्तिमें निषेध होता
ही है। निषेधात्मक अहिंसामें सत्प्रवृत्तिऔर सत्प्रवृत्यात्म क अहिंसामें
हिंसा का निषेधहोता है। हिंसा न करनेवाला यदिआँतरिक प्रवृत्तियों को
शुद्ध नकरे तो वह अहिंसा न होगी।इसलिए निषेधात्मकअहिंस ा में
सत्प्रवृत्ति की अपेक्षा रहती है, वह बाह्य हो चाहेआँतरिक, स्थूल हो चाहे
सूक्ष्म।सत्प्रव ृत्यात्मक अहिंसा में हिंसा का निषेध होना आवश्यक है।
इसके बिना कोईप्रवृत्ति सत् या अहिंसा नहीं हो सकती, यहनिश्चय दृष्टि की
बात है। व्यवहार में निषेधात्मक अहिंसा को निष्क्रिय अहिंसा और
विध्यात्मक अहिंसा को सक्रिय अहिंसा कहा जाताहै।
जैन ग्रंथ आचारांगसूत्रमें , जिसकासमय संभवत: तीसरी चौथी शताब्दी ई. पू.
है, अहिंसाका उपदेश इस प्रकारदिया गया है : भूत, भावी औरवर्तमान केअर्हत्
यही कहते हैं-किसी भी जीवित प्राणी को, किसी भी जंतुको, किसी भी वस्तु
कोजिसमें आत्मा है, न मारो, न (उससे) अनुचित व्यवहार करो, न अपमानित करो,
न कष्ट दो और न सताओ।
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति, ये सब अलग जीवहैं। पृथ्वी आदि हर
एकमें भिन्न-भिन्न व्यक्तित्व के धारक अलग-अलग जीव हैं। उपर्युक्त स्थावर
जीवोंके उपरांत न्नस (जंगम) प्राणी हैं, जिनमें चलने फिरने का
सामर्थ्यहोता है। ये ही जीवों केछह वर्ग हैं। इनके सिवाय दुनिया में
औरजीव नहीं हैं। जगत् मेंकोई जीव न्नस (जंगम) है औरकोई जीव स्थावर। एक
पर्याय में होना या दूसरीमें होना कर्मों कीविचित्रता है। अपनी-अपनीकमाई
है, जिससे जीव अन्न या स्थावर होते हैं। एक ही जीव जो एक जन्ममें
अन्नहोता है, दूसरे जन्म मेंस्थावर हो सकता है। न्नस हो या स्थावर,
सबजीवों को दु:ख अप्रिय होता है। यह समझकर मुमुक्षु सब जीवों के प्रति
अहिंसा भाव रखे।
सब जीव जीना चाहते हैं, मरना कोई नहीं चाहता। इसलिए निर्ग्रंथ प्राणिवध
का वर्जन करतेहैं। सभी प्राणियों को अपनी आयु प्रिय है, सुखअनुकूल है,
दु:ख प्रतिकूल है। जो व्यक्तिहरी वनस्पति काछेदन करताहै वह अपनी आत्मा को
दंड देनेवाला है। वह दूसरे प्राणियोंकाहनन करके परमार्थत: अपनी आत्मा का
ही हनन करता है।
आत्मा की अशुद्ध परिणतिमात्र हिंसा है; इसका समर्थन करते हुए
आचार्यअमृतचंद्र ने लिखा है : असत्य आदि सभी विकार आत्मपरिणति को
बिगाड़नेवाले हैं, इसलिएवे सब भी हिंसा हैं।असत्य आदि जो दोष बतलाए गए
हैं वे केवल”शिष्याबोधा य” हैं। संक्षेप में रागद्वेष का अप्रादुर्भाव
अहिंसाऔर उनका प्रादुर्भाव हिंसा है। रागद्वेषरहितप्र वृत्ति से अशक्य
कोटि का प्राणवध हो जाए तो भी नैश्चयिक हिंसा नहीं होती, रागद्वेषरहित
प्रवृत्ति से, प्राणवध न होने पर भी, वह होती है। जो रागद्वेष की
प्रवृत्तिकरता है वह अपनीआत्मा का ही घात करता है, फिर चाहे दूसरेजीवों
का घात करे यान करे। हिंसा से विरत नहोना भी हिंसा है और हिंसा में परिणत
होना भी हिंसा है। इसलिए जहाँ रागद्वेष की प्रवृत्ति है वहाँ निरंतर
प्राणवध होताहै।

Leave a Reply